पितृपक्ष : पूर्वजों को याद करने का पावन पर्व | श्राद्ध पक्ष का महत्व और परंपरा

पितृपक्ष क्या है?

पितृपक्ष को आप ऐसे समझें जैसे परिवार का एक सालाना स्मृति दिवस। यह वह समय होता है जब हम अपने पूर्वजों यानी दादा-दादी, परदादा-परदादी और उनसे भी पहले की पीढ़ियों को याद करते हैं। हिंदू परंपरा में माना जाता है कि पितृपक्ष में पूर्वजों की आत्माएं धरती पर आती हैं और अपने वंशजों के कर्मकांड देखती हैं।

यह अवधि भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या तक लगभग 16 दिनों तक चलती है। इस समय श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करना बेहद शुभ माना जाता है।

पितृपक्ष क्यों मनाया जाता है?

हम अक्सर अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ते हुए अपनी जड़ों को भूल जाते हैं। पितृपक्ष हमें याद दिलाता है कि हमारी पहचान उन्हीं पूर्वजों से जुड़ी है, जिन्होंने हमें जीवन और संस्कार दिए।

मान्यता है कि इस समय जब हम श्रद्धा से अपने पितरों को तर्पण और श्राद्ध करते हैं, तो वे प्रसन्न होकर हमें आशीर्वाद देते हैं।

  • परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
  • संतान सुख की प्राप्ति होती है।
  • आर्थिक समृद्धि आती है।

इसके विपरीत, अगर पितृपक्ष में श्राद्ध न किया जाए, तो पितृदोष लग सकता है, जिससे परिवार में कलह, रोग या आर्थिक परेशानियाँ आ सकती हैं।

पितृपक्ष में किए जाने वाले मुख्य कार्य

1. श्राद्ध

इसमें अपने पूर्वजों के नाम से भोजन तैयार किया जाता है और इसे ब्राह्मण, साधु या जरूरतमंदों को खिलाया जाता है। इसे पूर्वजों की आत्मा को संतुष्ट करने का सबसे बड़ा साधन माना गया है।

2. पिंडदान

आटे या चावल के पिंड बनाकर जल के साथ अर्पित किए जाते हैं। यह आत्मा की शांति का प्रतीक है और मृत्यु के बाद की यात्रा में मदद करता है।

3. तर्पण

तर्पण का अर्थ है—जल, तिल और कुशा घास अर्पित करके अपने पितरों को याद करना और उनकी आत्मा को तृप्त करना।

4. दान

पितृपक्ष में अन्न, वस्त्र या धन का दान बेहद पुण्यकारी माना जाता है। दान करते समय दिखावा नहीं, बल्कि सच्ची भावना होनी चाहिए।

पितृपक्ष का महत्व

पितृपक्ष सिर्फ धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है

  • यह परंपरा हमें सिखाती है कि हमें अपने पूर्वजों को कभी नहीं भूलना चाहिए
  • इससे परिवार में आदर और संस्कार बढ़ते हैं।
  • मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन बना रहता है।
  • समाज में प्रेम और कृतज्ञता का भाव पनपता है।

पौराणिक कथा: जोगे-भोगे की कहानी

कहानियों के बिना कोई भी परंपरा अधूरी लगती है। पितृपक्ष से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा है जोगे और भोगे की।

दो भाई थे—जोगे (अमीर) और भोगे (गरीब)। जोगे की पत्नी अहंकारी और धन-लोभी थी, जबकि भोगे की पत्नी सरल और दयालु। पितृपक्ष आया तो जोगे की पत्नी ने श्राद्ध का आग्रह किया, लेकिन जोगे ने इसे व्यर्थ समझा।

उधर भोगे और उसकी पत्नी ने अपनी सीमित साधनों के बावजूद सच्चे मन से श्राद्ध किया। जब पितर पहले जोगे के घर पहुंचे तो आधे-अधूरे आयोजन को देखकर दुखी हो गए। लेकिन भोगे के घर पहुंचे तो उनके सच्चे मन और श्रद्धा से प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया।

यह कथा हमें सिखाती है कि श्रद्धा और भावना सबसे महत्वपूर्ण है, न कि बाहरी दिखावा।

शास्त्रीय मान्यताएँ

शास्त्रों में बताया गया है कि—

  • श्राद्ध और तर्पण से पितरों को शांति मिलती है।
  • पूर्वज प्रसन्न होकर वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।
  • श्राद्ध न करने से पितर असंतुष्ट हो जाते हैं और परिवार में परेशानियाँ आती हैं।

पितृदोष क्या है?

जब पूर्वज असंतुष्ट रहते हैं तो जीवन में कई तरह की रुकावटें आती हैं। इसे ही पितृदोष कहा जाता है।

  • शादी में बाधा
  • संतान सुख में समस्या
  • आर्थिक तंगी
  • मानसिक अशांति

पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण करके इस दोष से मुक्ति पाई जा सकती है।

पितृपक्ष से जुड़ी धार्मिक मान्यताएँ

  • पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना पितृपक्ष में शुभ माना जाता है।
  • कुत्ते, गाय और कौओं को भोजन कराना भी पुण्यकारी होता है।
  • ब्राह्मणों और साधुओं को भोजन कराने से पूर्वज संतुष्ट होते हैं।

आधुनिक समय में पितृपक्ष का महत्व

आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में पितृपक्ष सिर्फ एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि परिवारिक जुड़ाव का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि हम अकेले नहीं हैं, बल्कि हमारी जड़ें और पहचान हमारे पूर्वजों से जुड़ी हैं।पितृपक्ष मनाने से बच्चों में भी संस्कार और कृतज्ञता की भावना जागृत होती है।


आसान शब्दों में निचोड़

पितृपक्ष यानी अपने पूर्वजों को याद करने का समय।

  • उनके नाम से पूजा, श्राद्ध और दान किया जाता है।
  • यह सिर्फ एक धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि प्रेम और आभार जताने का तरीका है।
  • पूर्वजों का आशीर्वाद हमारे जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाता है।

जाने श्राद्ध में पिंडदान और तर्पण का अंतर https://dailydosenews18.com/jane-pinddan-aur-tarpan-ka-antar/

 

 

 

FAQ

1. पितृपक्ष कब शुरू होता है और कब खत्म होता है?

पितृपक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या तक चलता है। यह कुल 16 दिन की अवधि होती है।

2. पितृपक्ष क्यों मनाया जाता है?

पितृपक्ष इसलिए मनाया जाता है ताकि पूर्वजों की आत्मा को शांति मिले और वे प्रसन्न होकर वंशजों को आशीर्वाद दें।

3. पितृपक्ष में क्या-क्या करना चाहिए?

पितृपक्ष में श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और दान करना चाहिए। साथ ही पीपल के पेड़ की पूजा और कौओं को भोजन कराना भी शुभ माना जाता है।

4. पितृदोष क्या होता है?

जब पूर्वज असंतुष्ट रहते हैं तो परिवार में बाधाएँ, आर्थिक तंगी और संतान सुख की समस्या आती है। इसे ही पितृदोष कहा जाता है।

5. क्या पितृपक्ष में विवाह, गृह प्रवेश या शुभ काम किए जा सकते हैं?

नहीं, पितृपक्ष में कोई भी शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश या नई शुरुआत करना वर्जित माना जाता है।

6. क्या पितृपक्ष में महिलाएँ श्राद्ध कर सकती हैं?

हाँ, यदि परिवार में कोई पुरुष सदस्य उपलब्ध न हो, तो महिलाएँ भी श्रद्धा भाव से श्राद्ध कर सकती हैं।

7. पितृपक्ष में दान क्यों जरूरी है?

दान को पितरों को संतुष्ट करने का सबसे सरल और पुण्यकारी तरीका माना जाता है। अन्न, वस्त्र और धन का दान पूर्वजों की आत्मा को शांति देता है।

8 .पितृपक्ष 2025 की तिथियाँ क्या हैं और किस दिन सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाती है?

पितृपक्ष 2025 की प्रमुख तिथियाँ

  • पूर्णिमा श्राद्ध: 7 सितंबर 2025 (रविवार)
  • प्रतिपदा श्राद्ध: 8 सितंबर 2025 (सोमवार)
  • द्वितीया श्राद्ध: 9 सितंबर 2025 (मंगलवार)
  • तृतीया श्राद्ध: 10 सितंबर 2025 (बुधवार)
  • चतुर्थी श्राद्ध: 10 सितंबर 2025 (बुधवार)
  • पंचमी श्राद्ध: 11 सितंबर 2025 (गुरुवार)
  • षष्ठी श्राद्ध: 12 सितंबर 2025 (शुक्रवार)
  • सप्तमी श्राद्ध: 13 सितंबर 2025 (शनिवार)
  • अष्टमी श्राद्ध: 14 सितंबर 2025 (रविवार)
  • नवमी श्राद्ध: 15 सितंबर 2025 (सोमवार)
  • दशमी श्राद्ध: 16 सितंबर 2025 (मंगलवार)
  • एकादशी श्राद्ध: 17 सितंबर 2025 (बुधवार)
  • द्वादशी श्राद्ध: 18 सितंबर 2025 (गुरुवार)
  • त्रयोदशी श्राद्ध: 19 सितंबर 2025 (शुक्रवार)
  • चतुर्दशी श्राद्ध: 20 सितंबर 2025 (शनिवार)
  • सर्वपितृ अमावस्या: 21 सितंबर 2025 (रविवार)

सर्वपितृ अमावस्या:- यह तिथि उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण हेतु विशेष मानी जाती है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारणवश अन्य तिथि पर श्राद्ध नहीं कर पाए हैं. इन तिथियों के अनुसार अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है, जिससे उनके आशीर्वाद की प्राप्ति और पितृदोष शांति मानी जाती है

 

 

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