पितृपक्ष में वर्जित मांगलिक कार्य: 6 बड़े ख़तरे और ज़रूरी बातें जो हर किसी को जाननी चाहिए

पितृपक्ष में वर्जित मांगलिक कार्य:- हिंदू धर्म में पितृपक्ष एक ऐसा पवित्र काल माना गया है जब हम अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए श्रद्धा से कर्मकांड करते हैं। इन दिनों को श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। मान्यता है कि यदि इस अवधि में विधिपूर्वक श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण किया जाए तो पितरों की आत्मा तृप्त होती है और वे अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

लेकिन इसी समय कुछ ऐसे काम करने से सख़्त मनाही होती है जिन्हें पितृपक्ष में वर्जित मांगलिक कार्य कहा गया है। क्यों? क्योंकि यह काल आनंद और उत्सव का नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम और आत्मचिंतन का माना गया है।

चलिए विस्तार से समझते हैं कि पितृपक्ष में वर्जित मांगलिक कार्य कौन-कौन से हैं और इनके पीछे धार्मिक, सामाजिक और व्यावहारिक कारण क्या हैं।

 

 

जानें:- https://en.wikipedia.org/wiki/Pitru_Paksha

1. विवाह और शादी-ब्याह

पितृपक्ष के दौरान विवाह जैसे शुभ और मांगलिक कार्य को पितृपक्ष में वर्जित मांगलिक कार्य माना गया है।

  • यह काल पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए समर्पित है, इसलिए इसमें हर्षोल्लास और उत्सव उचित नहीं माने जाते।
  • विवाह नई शुरुआत का प्रतीक है, जबकि पितृपक्ष त्याग और स्मरण का समय है।

इसीलिए ज्योतिषाचार्य और धर्मशास्त्र दोनों ही इस समय विवाह न करने की सलाह देते हैं।

2. गृह प्रवेश और नए घर में रहना शुरू करना

घर बनाना हर इंसान का सपना होता है और गृह प्रवेश बेहद शुभ कार्य माना जाता है। लेकिन पितृपक्ष में गृह प्रवेश करना अशुभ बताया गया है और इसे भी पितृपक्ष में वर्जित मांगलिक कार्य की श्रेणी में रखा गया है।

  • ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद पूरी तरह प्राप्त नहीं होता।
  • माना जाता है कि यदि इस अवधि को टालकर गृह प्रवेश किया जाए तो घर में सकारात्मक ऊर्जा और शांति बनी रहती है।

3. नया व्यवसाय या दुकान की शुरुआत

व्यापार या नया काम शुरू करना भी पितृपक्ष में वर्जित मांगलिक कार्य माना जाता है।

  • इस समय लाभ या सफलता की बजाय ध्यान पितरों के स्मरण और श्रद्धा पर केंद्रित होना चाहिए।
  • इस दौरान नया व्यवसाय शुरू करने से काम में बाधाएँ और रुकावटें आने की संभावना बढ़ जाती है।

4. बाल कटवाना और नाखून काटना

पितृपक्ष में कई स्थानों पर बाल कटवाना और नाखून काटना मना किया गया है।

  • धार्मिक मान्यता है कि यह पवित्र काल है और इन दिनों शारीरिक सजावट से बचना चाहिए।
  • अधिकतर परंपराओं में इसे पितृपक्ष में वर्जित मांगलिक कार्य की श्रेणी में ही रखा गया है।

5. तामसिक भोजन का सेवन

पितृपक्ष में भोजन के नियमों का विशेष महत्व है।

  • इस दौरान मांस, शराब, प्याज और लहसुन जैसी तामसिक वस्तुएँ पूरी तरह वर्जित हैं।
  • सात्विक भोजन (दाल, चावल, फल, दूध और शाकाहारी व्यंजन) को ही उचित माना गया है।

 तामसिक आहार को आत्मा की शांति में बाधक समझा जाता है।

6. मांगलिक आयोजन और मनोरंजन

संगीत, नृत्य, पार्टियाँ, उत्सव और अन्य मनोरंजन संबंधी आयोजन भी पितृपक्ष में वर्जित मांगलिक कार्य की सूची में आते हैं।

  • पितृपक्ष आत्मसंयम और ध्यान का समय है।
  • इन दिनों का उद्देश्य पूर्वजों का स्मरण और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति है, न कि मनोरंजन या मौज-मस्ती।

यदि मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो श्राद्ध कब करें :- https://dailydosenews18.com/pitru-paksha-2025-tithi-niyam-vargana/

पितृपक्ष में वर्जनाओं का महत्व

इन नियमों का पालन केवल अंधविश्वास नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी आध्यात्मिक और सामाजिक सोच है।

  • पूर्वजों की तृप्ति और आशीर्वाद – संयम और श्रद्धा से किए गए श्राद्ध से पितृ प्रसन्न होते हैं।
  • परिवार में शांति और समृद्धि – नियमों का पालन करने से घर का वातावरण सात्विक रहता है।
  • पितृदोष से मुक्ति – गलत तरीके से श्राद्ध करने पर परिवार पितृदोष से ग्रस्त हो सकता है।
  • आध्यात्मिक शुद्धि – यह समय आत्मचिंतन और संयम का है, जो मानसिक शांति भी देता है।

निष्कर्ष: पितरों का सम्मान ही सबसे बड़ा धर्म

पितृपक्ष केवल कर्मकांड का नाम नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर कृतज्ञता और स्मरण की भावना जगाने का अवसर है।इन दिनों पितृपक्ष में वर्जित मांगलिक कार्य से परहेज़ करके हम यह दिखाते हैं कि हमारे लिए पूर्वजों का आशीर्वाद सबसे महत्वपूर्ण है।

 जब हम श्रद्धा और नियमों का पालन करते हैं तो पूर्वज निश्चित ही प्रसन्न होकर परिवार को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

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