गरुड़ पुराण अनुसार श्राद्ध का महत्व हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और अनिवार्य माना गया है। हम सभी जानते हैं कि इंसान का जीवन जन्म और मृत्यु के चक्र से बंधा हुआ है। जब कोई व्यक्ति इस संसार को छोड़कर जाता है, तो उसकी आत्मा को शांति तभी मिलती है जब उसके वंशज उसे याद कर विधिपूर्वक कर्मकांड करें। यही कर्मकांड श्राद्ध कहलाता है।
श्राद्ध सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि यह अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता और आभार व्यक्त करने का माध्यम है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, पूर्वजों को याद करके उन्हें जल, भोजन और दान अर्पित करने से वे संतुष्ट होते हैं और वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्मा और वंशजों को जोड़ने वाला एक आध्यात्मिक बंधन है।
गरुड़ पुराण में विशेष रूप से कहा गया है कि –
“जिस घर में श्राद्ध नहीं किया जाता, वहाँ पितरों की आत्माएँ तृप्त नहीं होतीं और परिवार अनेक समस्याओं से घिर जाता है।”
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श्राद्ध का धार्मिक और शास्त्रीय महत्व

धर्मग्रंथों में श्राद्ध को पवित्र संस्कार माना गया है। यह केवल रस्म या कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्मा और आत्मीय रिश्ते का पुल है।
- गरुड़ पुराण – पितरों की तृप्ति और मोक्ष के लिए श्राद्ध का महत्व स्पष्ट करता है।
- विष्णु पुराण – बताता है कि श्रद्धा और विश्वास से किए गए श्राद्ध से पितर वंशजों को लंबी आयु, यश, धन और सौभाग्य प्रदान करते हैं।
- मार्कण्डेय पुराण – इसमें कहा गया है कि श्राद्ध से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
गरुड़ पुराण अनुसार श्राद्ध का महत्व और धार्मिक दृष्टि
गरुड़ पुराण के अनुसार, श्राद्ध के तीन मुख्य अंग हैं:
- पिंडदान – चावल, तिल, जौ और घी मिलाकर पिंड बनाए जाते हैं और पितरों को अर्पित किए जाते हैं। माना जाता है कि यह उनके लिए भोजन स्वरूप होता है।
- तर्पण – जल, दूध और काले तिल का अर्पण करते हुए मंत्रोच्चार किया जाता है। इससे पितरों की आत्मा संतोष और तृप्ति पाती है।
- ब्राह्मण भोज और दान – श्राद्ध के अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और दक्षिणा दी जाती है। इसे पितरों तक पहुंचने वाला पुण्य माना जाता है।
गरुड़ पुराण में कहा गया है कि – “श्रद्धा से किया गया एक तिल अर्पण भी पितरों को तृप्त करने के लिए पर्याप्त है।”
पितरों की तृप्ति – गरुड़ पुराण अनुसार श्राद्ध की विधि

1. स्नान और शुद्धि
सुबह स्नान कर स्वच्छ, सात्विक वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को शुद्ध करें और पितरों का आह्वान करें।
2. पिंडदान
चावल, तिल और जौ से पिंड बनाकर पितरों के नाम से अर्पित करें। यह मान्यता है कि पितर इसे भोजन स्वरूप ग्रहण करते हैं।
3. तर्पण
दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल, तिल और दूध अर्पित करें। मंत्रों का उच्चारण करते हुए तर्पण करें।
4. ब्राह्मण भोज और दान
श्राद्ध के अंतिम चरण में ब्राह्मणों को भोजन कराएं और यथाशक्ति दान करें। इसे पितरों की तृप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है।
5. श्रद्धा और भाव
श्राद्ध करते समय मन में केवल एक ही भावना रखें – “मैं अपने पितरों को याद कर रहा हूँ, उन्हें तृप्त कर रहा हूँ।” यही भावना श्राद्ध को पूर्ण बनाती है।
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श्राद्ध न करने के परिणाम
गरुड़ पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति श्राद्ध नहीं करता, उसके घर-परिवार पर पितृदोष लगता है। इसके दुष्परिणाम इस प्रकार हो सकते हैं –
- परिवार में अशांति और कलह
- आर्थिक समस्याएँ और अचानक हानि
- संतान संबंधी बाधाएँ
- बीमारियाँ और मानसिक तनाव
श्राद्ध करने से मिलने वाले लाभ
- पितरों की आत्मा को शांति – श्राद्ध से पूर्वजों को संतोष और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- पितृदोष शमन – परिवार से पितृदोष दूर होकर सुख-समृद्धि आती है।
- सांसारिक लाभ – धन, आयु, संतान सुख और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
- आध्यात्मिक लाभ – मन को शांति और संतोष मिलता है।
विभिन्न तीर्थ स्थलों पर श्राद्ध का महत्व
भारत के कई तीर्थस्थल श्राद्ध और पिंडदान के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
- गया जी (बिहार) – पितरों की मुक्ति के लिए सबसे बड़ा तीर्थ स्थल माना जाता है।
- ब्रह्मकपाल, बद्रीनाथ (उत्तराखंड) – यहाँ पिंडदान करने से पितरों को तुरंत मोक्ष मिलता है।
- पुष्कर (राजस्थान) – यहाँ श्राद्ध करने से 33 करोड़ देवताओं का आशीर्वाद मिलता है।
- गया के फल्गु नदी तट – गरुड़ पुराण में इसका विशेष महत्व बताया गया है।
पौराणिक कथाएँ और श्राद्ध
कथा 1: भीष्म पितामह और युधिष्ठिर
महाभारत के अनुसार, युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से धर्म और श्राद्ध का महत्व पूछा। भीष्म ने बताया कि पितरों की तृप्ति के बिना कोई भी कर्म सफल नहीं होता।
कथा 2: गया में पिंडदान की उत्पत्ति
कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने स्वयं असुर गयासुर को वरदान दिया था कि उसकी पीठ पर किया गया श्राद्ध पितरों को मुक्ति देगा। तभी से गया पिंडदान का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है।
FAQs – गरुड़ पुराण अनुसार श्राद्ध का महत्व
Q1. गरुड़ पुराण अनुसार पितरों को कैसे तृप्त किया जाता है?
पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज विधिपूर्वक करने से।
Q2. श्राद्ध में कौन-से मंत्र पढ़े जाते हैं?
ॐ पितृ गणाय विद्महे जगत धारिणये धीमहि तन्नो पितृ प्रचोदयात्
ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः
Q3. श्राद्ध न करने से क्या होता है?
परिवार पर पितृदोष लगता है, जिससे अशांति, आर्थिक नुकसान और संतान संबंधी समस्याएँ होती हैं।
Q4. क्या केवल पिंडदान करने से पितर तृप्त हो जाते हैं?
नहीं, पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज तीनों मिलकर पूर्ण श्राद्ध बनाते हैं।
Q5. श्राद्ध किसे करना चाहिए?
आमतौर पर घर के ज्येष्ठ पुत्र द्वारा किया जाता है, लेकिन कोई भी वंशज इसे कर सकता है।